Friday, 17 June 2011

कौन हूँ मैं ?


कौन हूँ मैं ?
क्या कहूं मैं
ग़र पूछता है कोई
पहचान मेरी ll

बड़े गर्व से कह देती हूँ मैं
'उनकी' पत्नी हूँ मैं ,
फलां-फलां जगह रहती हूँ मैं 
इतने बरस हुए 'उनसे' ब्याही हूँ मैं 

कौन हूँ मैं, ग़र पूछता है कोई,
बड़े प्यार से कह देती हूँ मैं,
अपने बच्चों की माँ हूँ मैं
देखके उनको जीती हूँ,उन पर ही तो मरती हूँ मैं

पूछता हर कोई जब मिलता है,
कौन हूँ मैं ?
आखिर, क्या करती हूँ मैं?
क्या किसी दफ्तर, या किसी व्यवसाय से जुड़ी हूँ मैं?

पीछा करते सवाल और
कस्तूरी जैसे जवाब 
सच ! बहुत हुआ 
अब तो सिर्फ परेशां हूँ मैं 

जहाँ  जाऊं, जिस से  मिलूँ 
सब आखिर तो यही कहते समझते हैं
कि एक संपूर्ण औरत हूँ मैं,
कि किसी की बीवी, किसी की माँ हूँ मैं 

फिर भी मन है कि बेहेलता नहीं,
खुद अपने से ही करता है सवाल,
बहुत सोचा, बहुत परखा है अपने आपको
बरसों बीते सुलझा न सकी इक छोटी सी बात को,
छोटी थी बात, पर शायद कुछ ज्यादा ही गहरी 

अब कुछ-कुछ समझने  लगी हूँ 
कि आखिर हूँ ही क्या मैं?
होती ही क्या हूँ मैं?
क्या कोई वजूद है मेरा?

एक बेरोजगार, अधेड़ औरत
हर सड़क, हर गली, हर कूचे-महल्ले में मिल जाती है जो,
किसी दुकान किसी घर में दिख जाती है जो,
एक आम सी साधारण औरत होती हूँ मैं 
एक आम सी साधारण जिंदगी जीती हूँ मैं

आखिर समझ गयी हूँ मैं
क्या कहना होगा मुझे जब पूछेगा कोई पहचान मेरी 
एक आम सी साधारण औरत हूँ मैं
हर गली हर मोहल्ले में रहती है जो,
बस ऎसी ही एक औरत हूँ मैं 

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