रेशमी रेशमी एक रजायी
छोटी थी मैं,
जब माँ ने बनवाई,
रेशमी रेशमी एक रजाई
सुर्ख चटख था रंग उसका
चार किलो था वज़न उसका
वो नरमाहट, वो गर्माहट
माँ जैसा ही रुप-स्वरुप था उसका
चौराहे वाले फन्ने सिद्दीकी
नयी-नयी दुल्हन थी जिनकी
याद है अब तक मुझको
उन्ही ने तो रुई धुनी थी
मेहंदी लगे हाथो ने
पक्के-पक्के धागों से की थी तगाई
तब जाकर बन पायी
रेशमी रेशमी एक रजाई
राम मिलन भय्या
रखकर उसको अपने सर
सीधे लेकर आये घर
“आ गयी आ गयी
मेरी रजाई आ गयी”
पर भय्या बोला,
नहीं नहीं दीदी “ तेरी नहीं,मेरी रजाई “
फिर एक बार घर में हुई लडाई
तय हुआ यह -एक दिन भय्या की
और -एक दिन रहेगी मेरी रजाई
हर सर्दी निकाली जाती
ओढने से पहले,
धूप में डाली जाती
रेशमी रेशमी एक रजाई
सर्दी दर सर्दी
खुशी के क्षणों में लोट-कूद कर
उसके ऊपर,
हक जतलाती अपना;
जब समय कठिन आता
मेरे ऊपर,
दुबक उसके अन्दर
सबसे दुःख छुपाती अपना
सखी बन गयी थी मेरी
रेशमी रेशमी एक रजाई
बड़ी हो गयी मैं
बूढी हो गयी वो,
ब्याह होने को था
और एक बार फिर घर में आयी
रेशमी रेशमी एक रजाई
“ फोरेन “ की है
कितनी कोमल कितनी हलकी
माँ ने बतलाया,
बोलीं “अब यही फैशन में है
रुई से ज्यादा गरमाती है
एक्रिलिक कहलाती है “
घर छूटा, छूटे माँ और बाप
और वो सब जो था मेरा
हो गया भाई का
और उसीकी हो गयी
रेशमी रेशमी वो रजाई
कितने पतझड़
कितने बसंत
कितने सावन बीत गए,
पर जब जब आती है सर्दी
याद आती मुझको
रेशमी रेशमी वही रजाई
जाती जब भी मैं पीहर
लाल्चाती आँखों से देखती
अपनी सखी को नैना भर कर
नहीं जुटा पाती हिम्मत
कह दूं “भय्या अब तो मुझको दे दो
रेशमी रेशमी ये रजाई “
समय विकट फिर कुछ ऐसा आया
छोड़ चला भय्या घर-बार,
माता पिता का साया
बना लिया उसने इक नया घर
जिसमे रहते गुडिया, मन्नू, भाभी और भाई
पीछे छोड़े गया तो बस - दुखदायी यादें
और रेशमी रेशमी एक रजाई
वो भी हो गयी थी बेकार उसके लिए
जैसे हो चले थे बेकार और बूढ़े,
माँ बाप उसके लिए
पर जैसा कह गए ज्ञानी-ध्यानी
कुछ तो अच्छा होता है
जब ऊपर वाला करता है मनमानी
अब सिर्फ और सिर्फ मेरे हैं,
मेरे माता-पिता
और रेशमी रेशमी वो रजाई
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